Thursday, 16 March 2017

दिल ढूँढता है फिर वही फुरसत के रात दिन......

घर से बिछड़ना नीरस नहीं है। ये करुण रस से परिपूर्ण होता है। लोगों से लेकर वस्तुवों तक में करुणा उत्पन्न हो जाती है। माँ के आँसू तो झलक जाते हैं पर दीदी पूरे समय खुद को संभाले रखती है। बाबा भी अगली बार दुबारा मिलने के लिए फिर से भेजते हैं। घर, आँगन, बगीचे, पगडण्डी सभी थोड़े उदास दिखाई देते हैं। छोटे भाई बहन आज रुक जाओ वाली जिद के साथ अगली बार आने की तारीख पूछते हैं। सभी थोड़ी जल्दबाजी करते हैं ताकि आंसू पलकों की किवाड़ खोल कर बाहर न झांक लें। केवल ये सूरज ही है जिसपे कोई फर्क नहीं पड़ता है। वो तो बस अगली सुबह कर्मभूमि पे मिलने का वादा कर चला जाता है। पर दिल तो फिर भी वही फुरसत के रात दिन ढूंढता रहता है..........