Monday, 31 July 2017

#RafiForever

"Chhoo lene do naajuk hothon ko"

Listen to the voice of #MohammedRafi in  this #classic song featuring #Rajkumar & #MeenaKumari. There is an interesting story behind the making of this song. Initially lyricist #SahirLudhianvi was told to right few lines for picturising #Rajkumar insisting #MeenaKumari to drink. There was no planning for any song at this moment because the director of the film #RamMaheshwari believed that a song can not be well picturized on #Rajkumar. But when Music Director #Ravi listen to those few lines written by #Sahir saahab, he made a very beautiful tone for them. When it was sung by #MohammedRafi in his #magnificent voice, the song became very popular and highly appraised.
#AllTimeGreat
#classic
#evergreen.
#BestOf60s.


Tuesday, 13 June 2017

हास्य व्यंग

एक ज़माना हुआ करता था, जब औरतें घर की चार दीवारों के बीच ही रहते हुए ज़िन्दगी बिता देती थीं। पुरुष ही बाजार जाते थे और औरतों का सामान भी वही खरीद कर लाते थे। कुछ बड़े घरानों में विक्रेता को ही कुछ खास अवसरों पर घर बुला लिया जाता था, और स्त्रियां उसके लिमिटेड स्टॉक में से ही अपनी पसंद चुन लेती थीं।

पर ऐसा हमेशा से नहीं था। सभ्यताओं की शुरुवात में पुरुष और स्त्री की समान भागीदारी थी। स्त्रियां भी शिकार करती थीं, खेती करती थीं, और बाज़ार भी जाती थीं। पर ये प्रथा तो बदलनी ही थी, वो भी औरतों की अपनी आदत के वजह से। हुआ यूँ की औरतें बाकी के सभी काम बड़ी फुर्ती से करती थीं, परंतु बाजार जाने पर वो सुबह की गयी शाम को ही लौटती थीं। इससे उनके बाकी के काम धरे के धरे रह जाते थें। इससे परेशान हो कर पुरुषों ने उनके बाज़ार जाने पर पाबंदी लगा दी।

फिर पुरुषों के करम टूटे-फूटे-जले सब कुछ हुआ😣। वो खुद को liberal बताने लगे। और स्त्रियों के अधिकार की बातें उठाने लगे। इन्ही सब के बीच स्त्रियों के बाजार जाने के अधिकार की भी बात उठी। और गयी भैंस पानी में........😜। हद तो तब हो गयी जब कुछ पुरुष अपनी माँ, बहन, बीवी के साथ बाज़ार ले जाने लगे। सबसे पहले इन्ही पुरुषों को जूते पड़ने चाहिए।😂 इसके बाद महिलाओं ने एक और अधिकार की मांग की कि अब पुरुषों को भी अपने घर की महिलाओं के साथ बाज़ार जाना पड़ेगा। और हो गया शुरू पुरुषों पर अत्याचार। आज बहुत से भाई, बेटे, पति और बॉयफ्रेंड भी इस अत्याचार को चुपचाप सह रहे हैं, और बेचारे यही गुनगुना रहे हैं - "उठाए जा उनके सितम.......... आंसू पिए जा।"

आज की इस प्रथा के एक बड़े वाहक ये बड़े-बड़े शौपिंग मॉल है, जो कुकुरमुत्ते की तरह बड़े शहरों की मार्किट को खाए जा रहे हैं। पर जो सबसे बड़ा वाहक है वो है शहरों की प्रसिद्ध स्ट्रीट मार्किट ; यानी एक खास इलाके में सड़कों पर लगने वाला लंबा चौड़ा बाज़ार। बनारस में गदौलिया, इलाहाबाद में कटरा, लखनऊ में अमीनाबाद, गोरखपुर में गोलघर वगैरह वगैरह........। ये जगहें औरतों के लिए स्वर्ग से भी बढ़कर है.......और यहाँ का कष्ट झेलने वाले पुरुष सबसे सहनशील प्राणी। छोटे शहरों में तो इतना स्कोप नहीं होता, लेकिन 'भैया ये वाला दिखाइए', 'सही लगाइये', 'रोज आप ही के यहां तो लेते हैं' ऐसे नारे वहाँ भी बुलंद हैं।

Notes -
1. ये पोस्ट पुरुषों का दर्द बयाँ करती है। अतः महिलाऐं न पढ़ें और अगर पढ़ लिया है तो संवेदना प्रकट करने के लिए चुप रहें।😫
2. यहाँ "गयी भैंस पानी में" इससे ये न समझें की महिलाऐं भैंस हैं।😝
3. इस पोस्ट को लिखने के लिए मेरी प्रेरणा बहन जी के साथ बाज़ार जाना थी।😭

Monday, 22 May 2017

आस्था और व्यापार - 4

गंगा की सुकून भरी लहरें...........

अष्टभुजा के इस अति कलुष अनुभव के बाद सिर भारी होने लगा। अभी भी दो मंदिरों के दर्शन करने बचे थे - कालीखोह और विंध्यवासिनी माता मंदिर। कालीखोह थोड़ा दूर था और नाम भी काफ़ी भयानक था, इसलिए उसे अगली बार के लिए ताल दिया। और विंध्यविसिनी मंदिर जाने का सबसे बड़ा उद्देश्य गंगा किनारे बैठना था। इसलिए अष्टभुजा के द्वार से विंध्यवासिनी के लिए ऑटोरिक्शा लिया और चल पड़े आस्था के सबसे बड़े बाज़ार में। रास्ते में ऑटो वाले अंकल विंडम फॉल के बारे में बात कर रहे थें। सुनकर मन में वहाँ जाने की दबी हुई इच्छा फिर से जागने लगी, पर किसी तरह उसे वापस सुलाया ये सांत्वना दे कर की गर्मी में वो सूख जाता है।
मुझे यह तो पता था की विंध्यवासिनी का अनुभव कटुतम होगा, फिर भी अनुभव करना था सो आ ही गए। सबसे पहले हमने शुरू की मंदिर की तलाश, पर पहुँच गए गंगा घाट। घाट पर आज इस दुपहरिया में कुछ ख़ास भीड़ नहीं थी। फिर भी बहुत से लोग अपने पाप धुलने के मगन थें। लोग साथ ही साथ में सेल्फ़ी वेल्फी भी ले रहे थे। पर मुझे उनसे क्या? मैंने तो एक सबसे शांत कोना पसंद किया। काफी देर तक वहाँ बैठा रहा। गंगा की शीतल लहरें पावों के साथ साथ मन को भी सुकून दे रही थीं। काफी देर तक ख्यालों में डूब रहा। पर अंततः उठ कर चल पड़ा मंदिर की तरफ एक कटुतम अनुभव का एहसास करने के लिए..................
                       .............क्रमशः

Friday, 19 May 2017

आस्था और व्यापार - 3

वसूली भाई.............

मंदिर के पुजारियों को ऊपर वाले ने अपना वसूली भाई नियुक्त किया है, ऐसा उनका मानना होगा। तभी तो मंदिर के पुजारी बिना किसी भय के जबरन वसूली करते हैं श्रद्धालुओं से। जब मैं लंबी सीढ़ियों को चढ़ कर ऊपर पहुंचा तो वहाँ एक अच्छी खासी लंबी लाइन लगी हुई थी। मैं भी लग गया लाइन में। लाइन धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी। सबसे पहले एक पञ्चदेव मंदिर पड़ता है। वहाँ शिव, गणेश, हनुमान, दुर्गा और विष्णु जी की छोटी छोटी मूर्तियां थी। अष्टभुजा में ऐसे 7-8 छोटे छोटे मंदिरों से हो कर गुजरती है हमारी लाइन। ये बस छोटे छोटे कक्ष होते हैं जिनके बगल से मत्था टेकते हुए लाइन गुजरती है। इन सभी मंदिरों में एक वसूली भाई बैठते हैं, जो आपसे जबरन सुविधा शुल्क वसूलते हैं। तो पहले पञ्चदेव में तो हम केवल हाथ जोड़ कर आगे बढ़ गए। अब एक बहुत ही छोटे द्वार से मंदिर के मुख्य गर्भगृह में जाना था। द्वार पर ही खड़े एक पुजारी ने निर्देश दिया - 'आप सभी दक्षिणा चढ़ाने के लिए पैसे निकाल लें।' वहाँ आपके पास और कोई विकल्प नहीं है। दक्षिणा तो चढ़ानी ही पड़ेगी, वरना आस्था का क्या? आशीर्वाद न मिलने का भी तो रिस्क है। और वसूली भाई की कर्कश आवाज तो पक्का आपके हाथों को बटुए तक पहुंचा ही देंगी। मैंने जेब में हाथ डाला। 5 रु का एक सिक्का निकाला और हाथ में ले लिया। अब अपना नम्बर आने पर मैंने प्रशाद, फूल, चुनरी पुजारी को पकड़ाए और 5 रु थाली में रख कर आरती ले ली। पुजारी ने हाथ पकड़ लिया। मानो मैंने पैसे रखे नहीं बल्कि निकाले हो। उसने बोला की माता के श्रृंगार के लिए कम से कम 10 रु चढ़ाना पड़ेगा। अब माता का श्रृंगार वो भी मेरे पैसों से, हमने और श्रद्धा बढ़ाई, और 10 रु निकाल के रख दिए।
अब हमने सोचा की ये सब ख़त्म हुआ और हम बाहर निकल के थोड़ा सेल्फ़ी वेल्फी लेंगे। लेकिन भैया! लाइन तो अभी भी बढ़ रही थी। आगे हनुमान जी की भी मूर्ती थी, बल-बुद्धि-विद्या के sale के लिए। हमने भी 5 रु चढ़ा कर थोड़ा सा बल और विद्या माँगा। लेकिन फिर पुजारी ने अधिक चढ़ावे की मांग की। हनुमान जी श्रृंगार तो नहीं करते लेकिन उनको भोग चढ़ाने के लिए थोड़ा अधिक धन लगता है, मंहगाई बढ़ गयी है न। अब हमारे पास छुट्टा भी नहीं बचा था। इसलिए 100 रु की नोट दिखा के बोले की छुट्टा इल्ले। लेकिन ई ल्यो! वसूली भाई ने 100 की नोट लेकर अपने बगल में बैठे cashier से 90 रुपये ले कर दे दिए। हमने पिछले 5 रु मांगे तो वसूली भाई ने बोला की वो तो चढ़ चुके। मैं 90 रु गिनता हुआ ठगा सा बाहर निकल रहा था। अभी लाइन को चार पांच और चैम्बर से होकर गुजरना था। सो हमने लाइन तोड़ना ही बेहतर समझा। अगर लाइन में होते तो चार पांच और देवी देवताओं को श्रृंगार या भोग लगवाना पड़ता। सो वापस सीढ़ियाँ उतरी, चप्पल पहने और मन्दिर के बाहर.................
                          .........क्रमशः

आस्था और व्यापार - 2

चप्पल और प्रशाद का combo pack.........

विंध्याचल जाना मेरे लिए बहुप्रतीक्षित था। परीक्षा ख़त्म होने के बाद ही यहाँ आने का प्लान बना लिया था। अब सबसे पहले हम पहुंचे अष्टभुजा माता मंदिर के द्वार पर। मंदिर ऊपर पहाड़ी पे स्थित था। इस लिए सैकड़ों सीढ़ियाँ चढ़ कर वहाँ पहुँचना होता है। मेन रोड से मंदिर की सड़क पर चलने लगा। दोनों तरफ दुकाने सजी थीं। कहीं चाय नास्ते की तो कहीं पूजा सामग्री की। '10 रु में कोई भी सामान' वाली दुकानें वहाँ सबसे अधिक थीं। उस गली को पार करने के बाद सीढ़ियाँ शुरू हुईँ। यहाँ चप्पल जूते उतारने की आवश्यकता थी। लेकिन मंदिर प्रशासन की कोई व्यवस्था नहीं थी आपके जूते चप्पल को रखने की। सो भारत भर के सैकड़ों मंदिरों की तरह यहाँ भी आदमी को एक डील करनी पड़ती है। उसे प्रशाद वालों से प्रशाद खरीदना पड़ता है, बदले में प्रशाद वाला उसके चप्पल की रखवाली करता है। यहां इस contract में यूँ तो कोई guarantee या indemnity नहीं मिलती, पर आदमी के पास और कोई चारा नहीं होता है। यूँ तो मुझे भी प्रशाद चढ़ाने में कोई विशेष श्रद्धा नहीं है। परन्तु चप्पल की सुरक्षा के लिए हमें भी ये कॉन्ट्रैक्ट करना पड़ा। सो हमने सबसे सस्ता वाला पैक चुना और प्रशाद ले कर ऊपर सीढ़ियों पर चल दिए.............
                       ...........क्रमशः 

आस्था और व्यापार - 1

आस्था का व्यापार...........

मैं नास्तिक नहीं हूँ। मै मूर्तिपूजा का विरोध भी नहीं करता हूँ। भगवान् की मूर्ती को मैं नितांत पत्थर का टुकड़ा नहीं मानता हूँ। मेरे लिए मूर्ती उस निराकार को साकार करने वाली एक प्रतीक है, और यही कारण है की मेरे मन में मूर्तियों के प्रति श्रद्धा भाव है। मुझे मंदिर जाना भी पसंद है। वहाँ जाकर थोड़ा शांति मिलती है। अपने अबतक के जीवन काल में बहुत से छोटे बड़े मंदिरों के दर्शन किये हैं। और लगभग सबका अनुभव बहुत ही मधुर रहा है, चाहे वो महाकालेश्वर हो या तिरुपति, काशी विश्वनाथ हो या रामेश्वरम, ओंकारेश्वर हो या मिनाक्षी देवी। सभी के दर्शन की कुछ मीठी यादें जुड़ी हैं। इन सभी में से कहीं भी मैंने कोई ज्यादती या उत्पीड़न नहीं महसूस किया। परंतु आज का मेरा अनुभव अत्यंत निराशाजनक रहा। आज मैंने विंध्य श्रेणी में स्थित विंध्याचल मंदिर और अष्टभुजा मंदिर के दर्शन किये। इन मंदिरों में पुजारी नहीं डाकू बसते हैं। ये लोगों की आस्था की बोली लगाते हैं। उनकी श्रद्धा के साथ खिलवाड़ करते हैं। यहाँ आ कर मंदिर आने वाला सुकून गायब हो जाता है। क्योंकि यहाँ आस्था का व्यापार होता है। .............

         .............क्रमशः

Monday, 24 April 2017


Porn.....porn.... 


"अं...भैइया ऊ.......ऊ वाली फिलिम धरे हैं का?"
"हाँ है"
"कैसे दिए हैं?"
"10 रुपिया मे 1GB"
"2 GB डाल दीजिए, और तनी नया नया भरियेगा।"
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तभी सनसनाती हुई एक जीप आ कर 'फलाने वीडियो गैलेरी' के सामने रुकती है।
5-6 पुलिस वाले निकलते हैं। कुछ फलाने की दुकान में, तो कुछ सामने वाले एक और फलाने की दुकान में घुस गए। दुकान मे से ग्राहक तो जल्दी से भाग लिए। अब बचे फलाने और पुलिस। कुछ नवजवान पुलिसिए तुरंत कम्प्यूटर और लैपटाप खंगालने लगे। कुछ मिला शायद। या फिर बहुत सारा कुछ।
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फलाने के हाथ पाँव फूलने लगे। काँपते हुए हांथों को जोड़ फलाने गिड़गिड़ाने लगे। पुलिस वाले ने फलाने को पकड़ा और जीप में बैठा दिया।
इ सारा हंगामा सुनकर फलाने की मेहरारू और लगभग 7 साल का लड़का घर के बाहर आ गए। फलाने कहिन कि अब्बै आवत हीं।
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इ सब देख फलाने के लड़के ने अपनी माँ से पूछा
"मम्मा। इ पुलिस काहें आइ थी।"
"पापा को काहें पकड़ ले गई।"
उनकी मम्मा के पास शायद कोई जवाब नही था।
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सड़क पर दो जन बात कर रहे थे-
"ई पुलिस काहें आई थी भइया?"
"अरे ऊ चेकिन हो रही थी ब्लू फिल्म वगैरह की।"
"ई काहें?"
"अरे ऊ पोर्न बैन हो गया है ना इसीलिए।"
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ये सब सुनकर लड़के ने अपनी माँ से एक और सवाल पूछ लिया।
सबसे कठिन सवाल।
"मम्मा ये 'पोर्न' क्या है?"



"ये नयन डरे डरे......."

हेमंत कुमार की शीतल आवाज़, कैफ़ी आज़मी की कलम का जादू, और background में आपकी one of the favourite वहीदा रेहमान....... शायद ही किसी और चीज की ज़रूरत होगी इस गाने पे पांचवा चाँद लगाने के लिए। ये गाना जिंदगी का पहला प्यार था। अभी भी है। और आज भी याद है, इस गाने के साथ बिताए हुए वो सारे हसीन पल। ये एक महज इत्तेफाक ही है की पहली बार इस गाने को कोहरे में ही सुना था।
 मैं विविध भारती का शुक्रगुज़ार हूँ, जिसने इस गाने की कुछ मीठी यादें मेरे लड़कपन के साथ नत्थी कर दी। आज भी वो रात याद है, वो कोहरे वाली रात, जब पहली बार इस गाने को सुना। विविध भारती पर, रात 10 बजे, छाया गीत में। सुनने के बाद रेडियो बंद कर दिया था, ताकि भूल न जाए। उस दौर में फ़ोन और downloading ये सब असुविधाएं नहीं थीं। ये love at first hearing था मेरे लिए, और आज तक साथ निभा रहा है। इसकी जगह शायद ही कभी किसी और गाने को दे पाऊँ।


Kohraa(1964)

यूँ तो मैं horror genre की फिल्में नहीं देखता हूँ। लेकिन आज एक thriller horror उठा ही ली - कोहरा(1964). एक अरसे से इस फ़िल्म को देखने की आस लगा रखी थी। बीते दिनों मेरे सबसे प्रिय गाने का जिक्र छिड़ा, जो इसी फ़िल्म से था। और वो आस फिर से जग उठी। फिर तो बस परीक्षा ख़त्म होने की प्रतीक्षा थी। कल परीक्षा ख़त्म और आज फ़िल्म देख ली।

फ़िल्म Daphne du Maurier के थ्रिलर उपन्यास Rebecca पर आधारित है। थोड़े से हॉरर और थोड़े से बस थोड़े से रोमांस के साथ बनी एक मनोरंजक थ्रिलर फ़िल्म। हाँ, बीच बीच में फ़िल्म का थ्रिलर थोड़ा कमजोर भी पड़ा है। पर फ़िल्म वाकई देखने के लायक है। और फ़िल्म के निर्देशक बिरेन नाग का काम काबिले तारीफ़ है।

अब फ़िल्म के गानों की बात। 60 के दशक के सबसे लोकप्रिय गीतों से सजी, संगीत की धनी फ़िल्म है ये। इसके गीत आज भी पुराने गीतों के दीवानों की जुबान पर रचे बसे हुए हैं। ये जादू यक़ीनन कैफ़ी आज़मी की कलम और हेमंत कुमार के संगीत का ही था, जो फ़िल्म के गीतों को एक सुनहरा मुकाम देने के लिए काफी था।

और अंत में किरदारों के अभिनय की बात। फ़िल्म में वहीदा रेहमान का किरदार और अभिनय सबसे उम्दा था। एक विरहिणी पत्नी का किरदार और उसके साथ किसी के दूसरी पत्नी होने का दोषबोध। ये सब कुछ बड़ी बखूबी के साथ निभाया वहीदा ने। विश्वजीत ने अपने अभिनय का वही नायाब नमूना दिखाया जो बीस साल बाद में देखने को मिला था। और एक महत्वपूर्ण किरदार ललिता पवार का। कोई कैसे भूल सकता है फ़िल्म के क्लाइमेक्स में उनका संवाद प्रेषण। अभिनय की महारथ हासिल थी उन्हें।
और अंत में एक बार फिर,
ये नयन डरे डरे.....
ये जाम भरे भरे.....
ज़रा पीने दो....

#BlastOfClassicPast




Thursday, 16 March 2017

दिल ढूँढता है फिर वही फुरसत के रात दिन......

घर से बिछड़ना नीरस नहीं है। ये करुण रस से परिपूर्ण होता है। लोगों से लेकर वस्तुवों तक में करुणा उत्पन्न हो जाती है। माँ के आँसू तो झलक जाते हैं पर दीदी पूरे समय खुद को संभाले रखती है। बाबा भी अगली बार दुबारा मिलने के लिए फिर से भेजते हैं। घर, आँगन, बगीचे, पगडण्डी सभी थोड़े उदास दिखाई देते हैं। छोटे भाई बहन आज रुक जाओ वाली जिद के साथ अगली बार आने की तारीख पूछते हैं। सभी थोड़ी जल्दबाजी करते हैं ताकि आंसू पलकों की किवाड़ खोल कर बाहर न झांक लें। केवल ये सूरज ही है जिसपे कोई फर्क नहीं पड़ता है। वो तो बस अगली सुबह कर्मभूमि पे मिलने का वादा कर चला जाता है। पर दिल तो फिर भी वही फुरसत के रात दिन ढूंढता रहता है..........