हास्य व्यंग
एक ज़माना हुआ करता था, जब औरतें घर की चार दीवारों के बीच ही रहते हुए ज़िन्दगी बिता देती थीं। पुरुष ही बाजार जाते थे और औरतों का सामान भी वही खरीद कर लाते थे। कुछ बड़े घरानों में विक्रेता को ही कुछ खास अवसरों पर घर बुला लिया जाता था, और स्त्रियां उसके लिमिटेड स्टॉक में से ही अपनी पसंद चुन लेती थीं।
पर ऐसा हमेशा से नहीं था। सभ्यताओं की शुरुवात में पुरुष और स्त्री की समान भागीदारी थी। स्त्रियां भी शिकार करती थीं, खेती करती थीं, और बाज़ार भी जाती थीं। पर ये प्रथा तो बदलनी ही थी, वो भी औरतों की अपनी आदत के वजह से। हुआ यूँ की औरतें बाकी के सभी काम बड़ी फुर्ती से करती थीं, परंतु बाजार जाने पर वो सुबह की गयी शाम को ही लौटती थीं। इससे उनके बाकी के काम धरे के धरे रह जाते थें। इससे परेशान हो कर पुरुषों ने उनके बाज़ार जाने पर पाबंदी लगा दी।
फिर पुरुषों के करम टूटे-फूटे-जले सब कुछ हुआ😣। वो खुद को liberal बताने लगे। और स्त्रियों के अधिकार की बातें उठाने लगे। इन्ही सब के बीच स्त्रियों के बाजार जाने के अधिकार की भी बात उठी। और गयी भैंस पानी में........😜। हद तो तब हो गयी जब कुछ पुरुष अपनी माँ, बहन, बीवी के साथ बाज़ार ले जाने लगे। सबसे पहले इन्ही पुरुषों को जूते पड़ने चाहिए।😂 इसके बाद महिलाओं ने एक और अधिकार की मांग की कि अब पुरुषों को भी अपने घर की महिलाओं के साथ बाज़ार जाना पड़ेगा। और हो गया शुरू पुरुषों पर अत्याचार। आज बहुत से भाई, बेटे, पति और बॉयफ्रेंड भी इस अत्याचार को चुपचाप सह रहे हैं, और बेचारे यही गुनगुना रहे हैं - "उठाए जा उनके सितम.......... आंसू पिए जा।"
आज की इस प्रथा के एक बड़े वाहक ये बड़े-बड़े शौपिंग मॉल है, जो कुकुरमुत्ते की तरह बड़े शहरों की मार्किट को खाए जा रहे हैं। पर जो सबसे बड़ा वाहक है वो है शहरों की प्रसिद्ध स्ट्रीट मार्किट ; यानी एक खास इलाके में सड़कों पर लगने वाला लंबा चौड़ा बाज़ार। बनारस में गदौलिया, इलाहाबाद में कटरा, लखनऊ में अमीनाबाद, गोरखपुर में गोलघर वगैरह वगैरह........। ये जगहें औरतों के लिए स्वर्ग से भी बढ़कर है.......और यहाँ का कष्ट झेलने वाले पुरुष सबसे सहनशील प्राणी। छोटे शहरों में तो इतना स्कोप नहीं होता, लेकिन 'भैया ये वाला दिखाइए', 'सही लगाइये', 'रोज आप ही के यहां तो लेते हैं' ऐसे नारे वहाँ भी बुलंद हैं।
Notes -
1. ये पोस्ट पुरुषों का दर्द बयाँ करती है। अतः महिलाऐं न पढ़ें और अगर पढ़ लिया है तो संवेदना प्रकट करने के लिए चुप रहें।😫
2. यहाँ "गयी भैंस पानी में" इससे ये न समझें की महिलाऐं भैंस हैं।😝
3. इस पोस्ट को लिखने के लिए मेरी प्रेरणा बहन जी के साथ बाज़ार जाना थी।😭
एक ज़माना हुआ करता था, जब औरतें घर की चार दीवारों के बीच ही रहते हुए ज़िन्दगी बिता देती थीं। पुरुष ही बाजार जाते थे और औरतों का सामान भी वही खरीद कर लाते थे। कुछ बड़े घरानों में विक्रेता को ही कुछ खास अवसरों पर घर बुला लिया जाता था, और स्त्रियां उसके लिमिटेड स्टॉक में से ही अपनी पसंद चुन लेती थीं।
पर ऐसा हमेशा से नहीं था। सभ्यताओं की शुरुवात में पुरुष और स्त्री की समान भागीदारी थी। स्त्रियां भी शिकार करती थीं, खेती करती थीं, और बाज़ार भी जाती थीं। पर ये प्रथा तो बदलनी ही थी, वो भी औरतों की अपनी आदत के वजह से। हुआ यूँ की औरतें बाकी के सभी काम बड़ी फुर्ती से करती थीं, परंतु बाजार जाने पर वो सुबह की गयी शाम को ही लौटती थीं। इससे उनके बाकी के काम धरे के धरे रह जाते थें। इससे परेशान हो कर पुरुषों ने उनके बाज़ार जाने पर पाबंदी लगा दी।
फिर पुरुषों के करम टूटे-फूटे-जले सब कुछ हुआ😣। वो खुद को liberal बताने लगे। और स्त्रियों के अधिकार की बातें उठाने लगे। इन्ही सब के बीच स्त्रियों के बाजार जाने के अधिकार की भी बात उठी। और गयी भैंस पानी में........😜। हद तो तब हो गयी जब कुछ पुरुष अपनी माँ, बहन, बीवी के साथ बाज़ार ले जाने लगे। सबसे पहले इन्ही पुरुषों को जूते पड़ने चाहिए।😂 इसके बाद महिलाओं ने एक और अधिकार की मांग की कि अब पुरुषों को भी अपने घर की महिलाओं के साथ बाज़ार जाना पड़ेगा। और हो गया शुरू पुरुषों पर अत्याचार। आज बहुत से भाई, बेटे, पति और बॉयफ्रेंड भी इस अत्याचार को चुपचाप सह रहे हैं, और बेचारे यही गुनगुना रहे हैं - "उठाए जा उनके सितम.......... आंसू पिए जा।"
आज की इस प्रथा के एक बड़े वाहक ये बड़े-बड़े शौपिंग मॉल है, जो कुकुरमुत्ते की तरह बड़े शहरों की मार्किट को खाए जा रहे हैं। पर जो सबसे बड़ा वाहक है वो है शहरों की प्रसिद्ध स्ट्रीट मार्किट ; यानी एक खास इलाके में सड़कों पर लगने वाला लंबा चौड़ा बाज़ार। बनारस में गदौलिया, इलाहाबाद में कटरा, लखनऊ में अमीनाबाद, गोरखपुर में गोलघर वगैरह वगैरह........। ये जगहें औरतों के लिए स्वर्ग से भी बढ़कर है.......और यहाँ का कष्ट झेलने वाले पुरुष सबसे सहनशील प्राणी। छोटे शहरों में तो इतना स्कोप नहीं होता, लेकिन 'भैया ये वाला दिखाइए', 'सही लगाइये', 'रोज आप ही के यहां तो लेते हैं' ऐसे नारे वहाँ भी बुलंद हैं।
Notes -
1. ये पोस्ट पुरुषों का दर्द बयाँ करती है। अतः महिलाऐं न पढ़ें और अगर पढ़ लिया है तो संवेदना प्रकट करने के लिए चुप रहें।😫
2. यहाँ "गयी भैंस पानी में" इससे ये न समझें की महिलाऐं भैंस हैं।😝
3. इस पोस्ट को लिखने के लिए मेरी प्रेरणा बहन जी के साथ बाज़ार जाना थी।😭
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