Monday, 22 May 2017

आस्था और व्यापार - 4

गंगा की सुकून भरी लहरें...........

अष्टभुजा के इस अति कलुष अनुभव के बाद सिर भारी होने लगा। अभी भी दो मंदिरों के दर्शन करने बचे थे - कालीखोह और विंध्यवासिनी माता मंदिर। कालीखोह थोड़ा दूर था और नाम भी काफ़ी भयानक था, इसलिए उसे अगली बार के लिए ताल दिया। और विंध्यविसिनी मंदिर जाने का सबसे बड़ा उद्देश्य गंगा किनारे बैठना था। इसलिए अष्टभुजा के द्वार से विंध्यवासिनी के लिए ऑटोरिक्शा लिया और चल पड़े आस्था के सबसे बड़े बाज़ार में। रास्ते में ऑटो वाले अंकल विंडम फॉल के बारे में बात कर रहे थें। सुनकर मन में वहाँ जाने की दबी हुई इच्छा फिर से जागने लगी, पर किसी तरह उसे वापस सुलाया ये सांत्वना दे कर की गर्मी में वो सूख जाता है।
मुझे यह तो पता था की विंध्यवासिनी का अनुभव कटुतम होगा, फिर भी अनुभव करना था सो आ ही गए। सबसे पहले हमने शुरू की मंदिर की तलाश, पर पहुँच गए गंगा घाट। घाट पर आज इस दुपहरिया में कुछ ख़ास भीड़ नहीं थी। फिर भी बहुत से लोग अपने पाप धुलने के मगन थें। लोग साथ ही साथ में सेल्फ़ी वेल्फी भी ले रहे थे। पर मुझे उनसे क्या? मैंने तो एक सबसे शांत कोना पसंद किया। काफी देर तक वहाँ बैठा रहा। गंगा की शीतल लहरें पावों के साथ साथ मन को भी सुकून दे रही थीं। काफी देर तक ख्यालों में डूब रहा। पर अंततः उठ कर चल पड़ा मंदिर की तरफ एक कटुतम अनुभव का एहसास करने के लिए..................
                       .............क्रमशः

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