Friday, 19 May 2017

आस्था और व्यापार - 3

वसूली भाई.............

मंदिर के पुजारियों को ऊपर वाले ने अपना वसूली भाई नियुक्त किया है, ऐसा उनका मानना होगा। तभी तो मंदिर के पुजारी बिना किसी भय के जबरन वसूली करते हैं श्रद्धालुओं से। जब मैं लंबी सीढ़ियों को चढ़ कर ऊपर पहुंचा तो वहाँ एक अच्छी खासी लंबी लाइन लगी हुई थी। मैं भी लग गया लाइन में। लाइन धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी। सबसे पहले एक पञ्चदेव मंदिर पड़ता है। वहाँ शिव, गणेश, हनुमान, दुर्गा और विष्णु जी की छोटी छोटी मूर्तियां थी। अष्टभुजा में ऐसे 7-8 छोटे छोटे मंदिरों से हो कर गुजरती है हमारी लाइन। ये बस छोटे छोटे कक्ष होते हैं जिनके बगल से मत्था टेकते हुए लाइन गुजरती है। इन सभी मंदिरों में एक वसूली भाई बैठते हैं, जो आपसे जबरन सुविधा शुल्क वसूलते हैं। तो पहले पञ्चदेव में तो हम केवल हाथ जोड़ कर आगे बढ़ गए। अब एक बहुत ही छोटे द्वार से मंदिर के मुख्य गर्भगृह में जाना था। द्वार पर ही खड़े एक पुजारी ने निर्देश दिया - 'आप सभी दक्षिणा चढ़ाने के लिए पैसे निकाल लें।' वहाँ आपके पास और कोई विकल्प नहीं है। दक्षिणा तो चढ़ानी ही पड़ेगी, वरना आस्था का क्या? आशीर्वाद न मिलने का भी तो रिस्क है। और वसूली भाई की कर्कश आवाज तो पक्का आपके हाथों को बटुए तक पहुंचा ही देंगी। मैंने जेब में हाथ डाला। 5 रु का एक सिक्का निकाला और हाथ में ले लिया। अब अपना नम्बर आने पर मैंने प्रशाद, फूल, चुनरी पुजारी को पकड़ाए और 5 रु थाली में रख कर आरती ले ली। पुजारी ने हाथ पकड़ लिया। मानो मैंने पैसे रखे नहीं बल्कि निकाले हो। उसने बोला की माता के श्रृंगार के लिए कम से कम 10 रु चढ़ाना पड़ेगा। अब माता का श्रृंगार वो भी मेरे पैसों से, हमने और श्रद्धा बढ़ाई, और 10 रु निकाल के रख दिए।
अब हमने सोचा की ये सब ख़त्म हुआ और हम बाहर निकल के थोड़ा सेल्फ़ी वेल्फी लेंगे। लेकिन भैया! लाइन तो अभी भी बढ़ रही थी। आगे हनुमान जी की भी मूर्ती थी, बल-बुद्धि-विद्या के sale के लिए। हमने भी 5 रु चढ़ा कर थोड़ा सा बल और विद्या माँगा। लेकिन फिर पुजारी ने अधिक चढ़ावे की मांग की। हनुमान जी श्रृंगार तो नहीं करते लेकिन उनको भोग चढ़ाने के लिए थोड़ा अधिक धन लगता है, मंहगाई बढ़ गयी है न। अब हमारे पास छुट्टा भी नहीं बचा था। इसलिए 100 रु की नोट दिखा के बोले की छुट्टा इल्ले। लेकिन ई ल्यो! वसूली भाई ने 100 की नोट लेकर अपने बगल में बैठे cashier से 90 रुपये ले कर दे दिए। हमने पिछले 5 रु मांगे तो वसूली भाई ने बोला की वो तो चढ़ चुके। मैं 90 रु गिनता हुआ ठगा सा बाहर निकल रहा था। अभी लाइन को चार पांच और चैम्बर से होकर गुजरना था। सो हमने लाइन तोड़ना ही बेहतर समझा। अगर लाइन में होते तो चार पांच और देवी देवताओं को श्रृंगार या भोग लगवाना पड़ता। सो वापस सीढ़ियाँ उतरी, चप्पल पहने और मन्दिर के बाहर.................
                          .........क्रमशः

1 comment:

  1. पहली बार किसी ने इतने संयोजित ढंग से आस्था का चित्रण किया है ।
    शत प्रतिशत सत्य है आपकी बात ।

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