आस्था का व्यापार...........
मैं नास्तिक नहीं हूँ। मै मूर्तिपूजा का विरोध भी नहीं करता हूँ। भगवान् की मूर्ती को मैं नितांत पत्थर का टुकड़ा नहीं मानता हूँ। मेरे लिए मूर्ती उस निराकार को साकार करने वाली एक प्रतीक है, और यही कारण है की मेरे मन में मूर्तियों के प्रति श्रद्धा भाव है। मुझे मंदिर जाना भी पसंद है। वहाँ जाकर थोड़ा शांति मिलती है। अपने अबतक के जीवन काल में बहुत से छोटे बड़े मंदिरों के दर्शन किये हैं। और लगभग सबका अनुभव बहुत ही मधुर रहा है, चाहे वो महाकालेश्वर हो या तिरुपति, काशी विश्वनाथ हो या रामेश्वरम, ओंकारेश्वर हो या मिनाक्षी देवी। सभी के दर्शन की कुछ मीठी यादें जुड़ी हैं। इन सभी में से कहीं भी मैंने कोई ज्यादती या उत्पीड़न नहीं महसूस किया। परंतु आज का मेरा अनुभव अत्यंत निराशाजनक रहा। आज मैंने विंध्य श्रेणी में स्थित विंध्याचल मंदिर और अष्टभुजा मंदिर के दर्शन किये। इन मंदिरों में पुजारी नहीं डाकू बसते हैं। ये लोगों की आस्था की बोली लगाते हैं। उनकी श्रद्धा के साथ खिलवाड़ करते हैं। यहाँ आ कर मंदिर आने वाला सुकून गायब हो जाता है। क्योंकि यहाँ आस्था का व्यापार होता है। .............
.............क्रमशः
मैं नास्तिक नहीं हूँ। मै मूर्तिपूजा का विरोध भी नहीं करता हूँ। भगवान् की मूर्ती को मैं नितांत पत्थर का टुकड़ा नहीं मानता हूँ। मेरे लिए मूर्ती उस निराकार को साकार करने वाली एक प्रतीक है, और यही कारण है की मेरे मन में मूर्तियों के प्रति श्रद्धा भाव है। मुझे मंदिर जाना भी पसंद है। वहाँ जाकर थोड़ा शांति मिलती है। अपने अबतक के जीवन काल में बहुत से छोटे बड़े मंदिरों के दर्शन किये हैं। और लगभग सबका अनुभव बहुत ही मधुर रहा है, चाहे वो महाकालेश्वर हो या तिरुपति, काशी विश्वनाथ हो या रामेश्वरम, ओंकारेश्वर हो या मिनाक्षी देवी। सभी के दर्शन की कुछ मीठी यादें जुड़ी हैं। इन सभी में से कहीं भी मैंने कोई ज्यादती या उत्पीड़न नहीं महसूस किया। परंतु आज का मेरा अनुभव अत्यंत निराशाजनक रहा। आज मैंने विंध्य श्रेणी में स्थित विंध्याचल मंदिर और अष्टभुजा मंदिर के दर्शन किये। इन मंदिरों में पुजारी नहीं डाकू बसते हैं। ये लोगों की आस्था की बोली लगाते हैं। उनकी श्रद्धा के साथ खिलवाड़ करते हैं। यहाँ आ कर मंदिर आने वाला सुकून गायब हो जाता है। क्योंकि यहाँ आस्था का व्यापार होता है। .............
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