Monday, 24 April 2017


Porn.....porn.... 


"अं...भैइया ऊ.......ऊ वाली फिलिम धरे हैं का?"
"हाँ है"
"कैसे दिए हैं?"
"10 रुपिया मे 1GB"
"2 GB डाल दीजिए, और तनी नया नया भरियेगा।"
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तभी सनसनाती हुई एक जीप आ कर 'फलाने वीडियो गैलेरी' के सामने रुकती है।
5-6 पुलिस वाले निकलते हैं। कुछ फलाने की दुकान में, तो कुछ सामने वाले एक और फलाने की दुकान में घुस गए। दुकान मे से ग्राहक तो जल्दी से भाग लिए। अब बचे फलाने और पुलिस। कुछ नवजवान पुलिसिए तुरंत कम्प्यूटर और लैपटाप खंगालने लगे। कुछ मिला शायद। या फिर बहुत सारा कुछ।
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फलाने के हाथ पाँव फूलने लगे। काँपते हुए हांथों को जोड़ फलाने गिड़गिड़ाने लगे। पुलिस वाले ने फलाने को पकड़ा और जीप में बैठा दिया।
इ सारा हंगामा सुनकर फलाने की मेहरारू और लगभग 7 साल का लड़का घर के बाहर आ गए। फलाने कहिन कि अब्बै आवत हीं।
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इ सब देख फलाने के लड़के ने अपनी माँ से पूछा
"मम्मा। इ पुलिस काहें आइ थी।"
"पापा को काहें पकड़ ले गई।"
उनकी मम्मा के पास शायद कोई जवाब नही था।
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सड़क पर दो जन बात कर रहे थे-
"ई पुलिस काहें आई थी भइया?"
"अरे ऊ चेकिन हो रही थी ब्लू फिल्म वगैरह की।"
"ई काहें?"
"अरे ऊ पोर्न बैन हो गया है ना इसीलिए।"
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ये सब सुनकर लड़के ने अपनी माँ से एक और सवाल पूछ लिया।
सबसे कठिन सवाल।
"मम्मा ये 'पोर्न' क्या है?"



"ये नयन डरे डरे......."

हेमंत कुमार की शीतल आवाज़, कैफ़ी आज़मी की कलम का जादू, और background में आपकी one of the favourite वहीदा रेहमान....... शायद ही किसी और चीज की ज़रूरत होगी इस गाने पे पांचवा चाँद लगाने के लिए। ये गाना जिंदगी का पहला प्यार था। अभी भी है। और आज भी याद है, इस गाने के साथ बिताए हुए वो सारे हसीन पल। ये एक महज इत्तेफाक ही है की पहली बार इस गाने को कोहरे में ही सुना था।
 मैं विविध भारती का शुक्रगुज़ार हूँ, जिसने इस गाने की कुछ मीठी यादें मेरे लड़कपन के साथ नत्थी कर दी। आज भी वो रात याद है, वो कोहरे वाली रात, जब पहली बार इस गाने को सुना। विविध भारती पर, रात 10 बजे, छाया गीत में। सुनने के बाद रेडियो बंद कर दिया था, ताकि भूल न जाए। उस दौर में फ़ोन और downloading ये सब असुविधाएं नहीं थीं। ये love at first hearing था मेरे लिए, और आज तक साथ निभा रहा है। इसकी जगह शायद ही कभी किसी और गाने को दे पाऊँ।


Kohraa(1964)

यूँ तो मैं horror genre की फिल्में नहीं देखता हूँ। लेकिन आज एक thriller horror उठा ही ली - कोहरा(1964). एक अरसे से इस फ़िल्म को देखने की आस लगा रखी थी। बीते दिनों मेरे सबसे प्रिय गाने का जिक्र छिड़ा, जो इसी फ़िल्म से था। और वो आस फिर से जग उठी। फिर तो बस परीक्षा ख़त्म होने की प्रतीक्षा थी। कल परीक्षा ख़त्म और आज फ़िल्म देख ली।

फ़िल्म Daphne du Maurier के थ्रिलर उपन्यास Rebecca पर आधारित है। थोड़े से हॉरर और थोड़े से बस थोड़े से रोमांस के साथ बनी एक मनोरंजक थ्रिलर फ़िल्म। हाँ, बीच बीच में फ़िल्म का थ्रिलर थोड़ा कमजोर भी पड़ा है। पर फ़िल्म वाकई देखने के लायक है। और फ़िल्म के निर्देशक बिरेन नाग का काम काबिले तारीफ़ है।

अब फ़िल्म के गानों की बात। 60 के दशक के सबसे लोकप्रिय गीतों से सजी, संगीत की धनी फ़िल्म है ये। इसके गीत आज भी पुराने गीतों के दीवानों की जुबान पर रचे बसे हुए हैं। ये जादू यक़ीनन कैफ़ी आज़मी की कलम और हेमंत कुमार के संगीत का ही था, जो फ़िल्म के गीतों को एक सुनहरा मुकाम देने के लिए काफी था।

और अंत में किरदारों के अभिनय की बात। फ़िल्म में वहीदा रेहमान का किरदार और अभिनय सबसे उम्दा था। एक विरहिणी पत्नी का किरदार और उसके साथ किसी के दूसरी पत्नी होने का दोषबोध। ये सब कुछ बड़ी बखूबी के साथ निभाया वहीदा ने। विश्वजीत ने अपने अभिनय का वही नायाब नमूना दिखाया जो बीस साल बाद में देखने को मिला था। और एक महत्वपूर्ण किरदार ललिता पवार का। कोई कैसे भूल सकता है फ़िल्म के क्लाइमेक्स में उनका संवाद प्रेषण। अभिनय की महारथ हासिल थी उन्हें।
और अंत में एक बार फिर,
ये नयन डरे डरे.....
ये जाम भरे भरे.....
ज़रा पीने दो....

#BlastOfClassicPast