Monday, 24 April 2017

Kohraa(1964)

यूँ तो मैं horror genre की फिल्में नहीं देखता हूँ। लेकिन आज एक thriller horror उठा ही ली - कोहरा(1964). एक अरसे से इस फ़िल्म को देखने की आस लगा रखी थी। बीते दिनों मेरे सबसे प्रिय गाने का जिक्र छिड़ा, जो इसी फ़िल्म से था। और वो आस फिर से जग उठी। फिर तो बस परीक्षा ख़त्म होने की प्रतीक्षा थी। कल परीक्षा ख़त्म और आज फ़िल्म देख ली।

फ़िल्म Daphne du Maurier के थ्रिलर उपन्यास Rebecca पर आधारित है। थोड़े से हॉरर और थोड़े से बस थोड़े से रोमांस के साथ बनी एक मनोरंजक थ्रिलर फ़िल्म। हाँ, बीच बीच में फ़िल्म का थ्रिलर थोड़ा कमजोर भी पड़ा है। पर फ़िल्म वाकई देखने के लायक है। और फ़िल्म के निर्देशक बिरेन नाग का काम काबिले तारीफ़ है।

अब फ़िल्म के गानों की बात। 60 के दशक के सबसे लोकप्रिय गीतों से सजी, संगीत की धनी फ़िल्म है ये। इसके गीत आज भी पुराने गीतों के दीवानों की जुबान पर रचे बसे हुए हैं। ये जादू यक़ीनन कैफ़ी आज़मी की कलम और हेमंत कुमार के संगीत का ही था, जो फ़िल्म के गीतों को एक सुनहरा मुकाम देने के लिए काफी था।

और अंत में किरदारों के अभिनय की बात। फ़िल्म में वहीदा रेहमान का किरदार और अभिनय सबसे उम्दा था। एक विरहिणी पत्नी का किरदार और उसके साथ किसी के दूसरी पत्नी होने का दोषबोध। ये सब कुछ बड़ी बखूबी के साथ निभाया वहीदा ने। विश्वजीत ने अपने अभिनय का वही नायाब नमूना दिखाया जो बीस साल बाद में देखने को मिला था। और एक महत्वपूर्ण किरदार ललिता पवार का। कोई कैसे भूल सकता है फ़िल्म के क्लाइमेक्स में उनका संवाद प्रेषण। अभिनय की महारथ हासिल थी उन्हें।
और अंत में एक बार फिर,
ये नयन डरे डरे.....
ये जाम भरे भरे.....
ज़रा पीने दो....

#BlastOfClassicPast




No comments:

Post a Comment